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Business News: त्योहारों से पहले चीनी के दाम में उछाल, 70 रुपये किलो के करीब पहुंचा भाव

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | त्योहारों से पहले चीनी के दाम में तेज उछाल, खुदरा कीमत करीब 70 रुपये किलो पहुंची, सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक लिमिट तय की।

डेस्क, नई दिल्ली, 24 अगस्त।त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले ही रसोई में इस्तेमाल होने वाली चीनी ने आम परिवारों का बजट बिगाड़ना शुरू कर दिया है। देश के कई प्रमुख बाजारों में चीनी के खुदरा भाव पिछले कुछ समय में तेजी से बढ़े हैं और कीमत करीब 70 रुपये प्रति किलो के आसपास पहुंच गई है। त्योहारों के दौरान मिठाई, खीर, हलवा, चाय और दूसरे व्यंजनों में चीनी की खपत बढ़ने के कारण आने वाले दिनों में घरेलू मांग और बढ़ने की संभावना है।

चीनी की कीमतों में इस तेजी के पीछे केवल त्योहारों की मांग नहीं है। चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति, गन्ने की बढ़ती लागत, बाजार में उपलब्ध स्टॉक, एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के इस्तेमाल और चीनी की आपूर्ति से जुड़े कई कारण एक साथ असर डाल रहे हैं। सरकार ने भी बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बाजार में हस्तक्षेप शुरू कर दिया है।

थोक खरीदारों के लिए स्टॉक लिमिट

त्योहारों के दौरान जमाखोरी और कृत्रिम कमी पैदा होने की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार ने थोक खरीदारों के लिए चीनी रखने की सीमा तय करने का फैसला किया है। 1 सितंबर से 30 नवंबर तक थोक खरीदारों को सीमित मात्रा में ही चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति होगी। यह सीमा घटाकर करीब 15 दिनों की खपत के बराबर की गई है।

सरकार का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहे और कारोबारी भविष्य में कीमत बढ़ने की उम्मीद में बड़े पैमाने पर स्टॉक जमा न कर सकें। हाल की रिपोर्टों में भी सरकार की ओर से स्टॉक सीमा और आयात जैसे कदमों के जरिए कीमतों पर नियंत्रण की कोशिश का उल्लेख किया गया है।

10 लाख टन कच्ची चीनी आयात की अनुमति

घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने 20 अगस्त को 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह आयात टैरिफ रेट कोटा व्यवस्था के तहत किया जाएगा और इसके लिए 30 अक्टूबर तक की समयसीमा रखी गई है।

सरकार की कोशिश है कि त्योहारों के दौरान चीनी की बढ़ती मांग को घरेलू उत्पादन और उपलब्ध स्टॉक के साथ आयात के जरिए भी संतुलित किया जाए। हालांकि, चीनी उद्योग का तर्क है कि मौजूदा कीमतों को केवल महंगाई के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि पिछले वर्षों में मिलों को उत्पादन लागत के मुकाबले कम कीमत पर चीनी बेचनी पड़ी है।

मिलों का दावा- लागत से कम भाव पर बिक रही थी चीनी

चीनी उद्योग के प्रतिनिधियों का कहना है कि पिछले कई वर्षों से मिलों पर लागत और बिक्री मूल्य के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। नेशनल फेडरेशन ऑफ शुगर कोऑपरेटिव्स के अध्यक्ष जयप्रकाश दांडेगांवकर के मुताबिक, पिछले चार साल से चीनी मिलें अपनी उत्पादन लागत से कम कीमत पर चीनी बेचती रही हैं।

उनका कहना है कि उद्योग को टिकाऊ स्थिति में लाने के लिए चीनी का भाव करीब 45 रुपये प्रति किलो के आसपास होना चाहिए। उद्योग का तर्क है कि यदि मिलों को बेहतर कीमत मिलती है तो उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी और इसका फायदा गन्ना किसानों तक भी पहुंच सकता है।

दांडेगांवकर के मुताबिक पिछले चीनी सीजन में आर्थिक दबाव के कारण कुछ मिलों ने निर्धारित रिलीज कोटे से अधिक चीनी बाजार में बेच दी। इसका असर मौजूदा समय में बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर पड़ा है।

उत्पादन लागत और बिक्री भाव में बड़ा अंतर

महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज फेडरेशन के प्रबंध निदेशक संजय खताल ने चीनी उद्योग की मुश्किल को आंकड़ों के जरिए समझाया है। उनके अनुसार चीनी की उत्पादन लागत करीब 4,350 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि मिलों को लगभग 3,825 रुपये प्रति क्विंटल के एक्स-मिल भाव पर चीनी बेचनी पड़ी।

यानी उत्पादन और बिक्री के बीच करीब 525 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर है। उद्योग का कहना है कि इस अंतर के कारण मिलों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ा है और कई इकाइयों को कर्ज चुकाने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

महाराष्ट्र के चीनी उद्योग ने सरकार से आसान शर्तों पर कर्ज और मौजूदा ऋण के पुनर्गठन की मांग भी की है, ताकि मिलों को कार्यशील पूंजी मिल सके और किसानों का भुगतान प्रभावित न हो।

FRP बढ़ा, लेकिन चीनी के भाव में उतनी तेजी नहीं

कोल्हापुर के वारणा समूह से जुड़े विनय कोरे सावकर का कहना है कि पिछले एक दशक में गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य यानी FRP लगभग 28 फीसदी बढ़ा है, लेकिन चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य लंबे समय तक लगभग 3,100 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बना रहा।

FRP वह न्यूनतम कीमत है, जो चीनी मिलों को किसानों से खरीदे गए गन्ने के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार चुकानी होती है। जैसे-जैसे गन्ने की लागत बढ़ती है, मिलों की उत्पादन लागत भी बढ़ती है। ऐसे में उद्योग लगातार चीनी के बिक्री मूल्य को लागत के अनुरूप बढ़ाने की मांग करता रहा है।

महाराष्ट्र के आधिकारिक चीनी विभाग के अनुसार राज्य में चीनी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा सहकारी व्यवस्था से जुड़ा है और महाराष्ट्र देश के प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में है।

उद्योगों और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए अलग कीमत का सुझाव

चीनी की कीमतों को लेकर उद्योग की ओर से एक अलग व्यवस्था का सुझाव भी सामने आया है। विनय कोरे सावकर का कहना है कि घरेलू उपभोक्ताओं और बड़े औद्योगिक खरीदारों के लिए अलग-अलग मूल्य व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।

उनके मुताबिक आइसक्रीम, सॉफ्ट ड्रिंक, कन्फेक्शनरी और दवा उद्योग जैसी कंपनियां बड़े पैमाने पर चीनी का इस्तेमाल करती हैं। इसलिए इन उद्योगों को घरेलू उपभोक्ताओं की तुलना में अलग कीमत पर चीनी उपलब्ध कराई जा सकती है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह होगा कि आम परिवारों के लिए चीनी की कीमत नियंत्रित रहे, जबकि बड़े औद्योगिक खरीदार बाजार आधारित कीमत पर चीनी खरीदें। हालांकि, ऐसी व्यवस्था लागू करने के लिए सरकार को बाजार, उद्योग और उपभोक्ता हितों के बीच संतुलन बनाना होगा।

किसान नेता ने उठाए सवाल

जहां चीनी मिलें बढ़ी कीमत को अपने लिए राहत के तौर पर देख रही हैं, वहीं किसान नेता और पूर्व लोकसभा सांसद राजू शेट्टी ने कीमतों में इस उछाल पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि यदि देश में त्योहारों तक मांग पूरी करने लायक पर्याप्त स्टॉक मौजूद है तो कीमतों में लगातार तेजी का कारण स्पष्ट किया जाना चाहिए।

शेट्टी का तर्क है कि चीनी की कीमत बढ़ने का वास्तविक फायदा किसानों के बजाय व्यापारियों को मिल सकता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब अगले सीजन में भी उत्पादन मांग के अनुरूप रहने की उम्मीद है तो मौजूदा समय में इतनी तेज बढ़ोतरी क्यों हो रही है।

महाराष्ट्र में गन्ने का बड़ा आधार

महाराष्ट्र देश के सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों में शामिल है। 2024-25 में राज्य में करीब 13.7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती हुई थी। इससे पहले 2023 में यह क्षेत्र करीब 14 लाख हेक्टेयर और 2022-23 में लगभग 14.8 लाख हेक्टेयर था।

2025-26 के पिछले पेराई सीजन में लगभग 16 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पैदा हुए 1,045.6 लाख मीट्रिक टन गन्ने की 208 सहकारी और निजी चीनी मिलों ने पेराई की। इस दौरान चीनी उत्पादन करीब 99 लाख टन रहा, जो इससे पिछले सीजन के लगभग 81.04 लाख टन से अधिक था।

महाराष्ट्र ने 2025-26 में देश के कुल चीनी उत्पादन में करीब एक-तिहाई योगदान दिया। राज्य में चीनी उद्योग का आकार इतना बड़ा है कि यहां चीनी मिलों के साथ एथेनॉल, बिजली उत्पादन और दूसरे सह-उत्पाद भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं।

एथेनॉल ने भी बदला गणित

चीनी उद्योग में एथेनॉल उत्पादन की भूमिका बढ़ने से गन्ने और चीनी के बीच संतुलन का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है। गन्ने से एथेनॉल उत्पादन बढ़ने पर बाजार में सीधे चीनी के रूप में आने वाली मात्रा प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि चीनी उद्योग की मौजूदा कीमतों की चर्चा में एथेनॉल नीति भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है।

सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे त्योहारों के दौरान आम लोगों को महंगी चीनी से राहत दिलानी है, दूसरी तरफ चीनी मिलों और गन्ना किसानों की आर्थिक स्थिति को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

त्योहारों में बढ़ेगा घरेलू खर्च

चीनी की कीमत में 10 या 20 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी सुनने में भले छोटी लगे, लेकिन त्योहारों के समय इसका असर कई स्तर पर दिखाई देता है। घरों में मिठाई और पकवान बनाने के साथ-साथ हलवाई, बेकरी, मिठाई दुकानों और छोटे खाद्य कारोबारियों की लागत भी बढ़ती है। कारोबारियों की लागत बढ़ने पर उसका कुछ हिस्सा अंततः ग्राहकों तक पहुंच सकता है।

इसलिए आने वाले महीनों में सरकार की स्टॉक लिमिट, आयात और बाजार निगरानी जैसे कदम कितने प्रभावी साबित होते हैं, यह महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल चीनी बाजार में तेजी ने त्योहारों से पहले एक ऐसा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि मिठास बरकरार रखने के लिए बढ़ती लागत का बोझ आखिर किसान, मिल, कारोबारी या उपभोक्ता—किसे उठाना पड़ेगा।

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